1 साल तक बना रहा CEO, हर महीने उठाई 2.80 लाख सैलरी! HR टीम ने F&F सेटलमेंट किया तो उड़ गए होश; बॉस को पहुंचा दिया जेल
किसी बड़ी कंपनी में ऊंचे पद पर नौकरी पाने के लिए एक्सपीरियंस और सैलरी से जुड़े डॉक्यूमेंट्स जमा करना सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ऐसा मामला सामने आया, जहां एक शख्स ने इसी प्रक्रिया को फर्जी दस्तावेजों के सहारे पार कर लिया. उसने खुद को एक बड़े ग्रुप का पूर्व कर्मचारी बताया, लाखों रुपये महीने की सैलरी पाने का दावा किया और इसी आधार पर ऑटोमोबाइल कंपनी में ऊंचे पद पर नौकरी हासिल कर ली.
मामला यहीं नहीं रुका. कंपनी ने उसके काम को देखते हुए उसे ग्रुप वाइस प्रेसिडेंट से आगे बढ़ाकर ग्रुप CEO (आफ्टर सेल्स) की जिम्मेदारी भी सौंप दी. करीब नौ महीने तक वह कंपनी में ऊंचे पद पर काम करता रहा. लेकिन मई 2026 में अचानक उसके इस्तीफे के बाद जब कंपनी ने फुल एंड फाइनल सेटलमेंट की प्रक्रिया शुरू की, तो उसके दस्तावेजों की दोबारा जांच हुई. यहीं से उस कहानी का खुलासा हुआ, जिसे उसने नौकरी पाने के समय कागजों में तैयार किया था.
2.80 लाख रुपये महीने की सैलरी का दावा
ग्वालियर क्राइम ब्रांच के मुताबिक, आरोपी की पहचान देवेंद्र कुमार दुबे (43) पुत्र रामनरेश दुबे निवासी कानपुर उत्तर प्रदेश के रूप में हुई.
पुलिस के अनुसार, देवेंद्र कुमार ने 20 अगस्त 2025 को श्रीतुलजा भवानी ऑटोमोबाइल्स प्राइवेट लिमिटेड में ग्रुप वाइस प्रेसिडेंट के पद पर जॉब हासिल की थी. इसके लिए उसने अपने पुराने एक्सपीरियंस और सैलरी से जुड़े डॉक्यूमेंट्स कंपनी के सामने पेश किए.
इनमें एक एक्सपीरियंस सार्टिफिकेट और लैंडमार्क ग्रुप के नाम से तैयार किया गया बैंक स्टेटमेंट शामिल था. इस बैंक स्टेटमेंट में उसकी महीने की सैलरी 2 लाख 80 हजार 670 बताई गई थी. पुलिस के मुताबिक, डॉक्यूमेंट्स पर आरोपी के सिग्नेचर भी थे.
इन डॉक्यूमेंट्स के आधार पर कंपनी को यह विश्वास हुआ कि वह पहले लैंडमार्क ग्रुप में काम कर चुका है और वहां उसे करीब पौने तीन लाख रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था. इसके बाद उसे कंपनी में ऊंचे पद पर नियुक्त किया गया.
नौकरी मिलने के बाद देवेंद्र ने कंपनी में काम करना शुरू किया. पुलिस के अनुसार, कंपनी मैनेजमेंट उसके काम से संतुष्ट था. इसी दौरान उसकी जिम्मेदारियां बढ़ाई गईं और उसे ग्रुप CEO (आफ्टर सेल्स) का प्रभार सौंप दिया गया. यानी जिस नौकरी को हासिल करने के लिए उसने कथित तौर पर पुराने अनुभव और वेतन के फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया था, उसी के आधार पर वह कंपनी में और ऊंचे पद तक पहुंच गया.
करीब नौ महीने तक सब कुछ सामान्य चलता रहा. फिर मई 2026 में देवेंद्र ने अचानक कंपनी से इस्तीफा दे दिया. यही इस्तीफा आगे चलकर उसके लिए सबसे बड़ी मुश्किल की वजह बन गया.
नौकरी छोड़ने के बाद कंपनी में उसका फुल एंड फाइनल सेटलमेंट तैयार किया जा रहा था. इसी दौरान HR टीम ने उसके पुराने रोजगार और वेतन से जुड़े दस्तावेजों का दोबारा सत्यापन शुरू किया. कंपनी ने यह पता लगाने की कोशिश की कि जिस लैंडमार्क ग्रुप में काम करने का दावा देवेंद्र ने किया था, वहां उसका वास्तव में रोजगार रहा भी था या नहीं. जांच आगे बढ़ी तो कहानी उलट गई.
पुलिस के मुताबिक, सत्यापन में सामने आया कि देवेन्द्र ने लैंडमार्क ग्रुप में नौकरी ही नहीं की थी. यानी जिस कंपनी के अनुभव के आधार पर उसने खुद को अनुभवी अधिकारी बताया था, वहां उसके रोजगार का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला. इसके बाद उसके द्वारा जमा किए गए सैलरी स्टेटमेंट पर भी सवाल खड़े हुए. करीब 2.80 लाख रुपये प्रतिमाह वेतन दिखाने वाला बैंक स्टेटमेंट भी जांच के घेरे में आ गया.
HR टीम को दस्तावेजों में कथित फर्जीवाड़े का पता चला तो कंपनी प्रबंधन को इसकी जानकारी दी गई.
दस्तावेजों की जांच में कथित फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद कंपनी की ओर से ग्वालियर क्राइम ब्रांच में शिकायत दर्ज कराई गई.
पुलिस ने आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने व उनका इस्तेमाल करने से जुड़ी धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू की. पुलिस के अनुसार मामले में अपराध क्रमांक 33/26 दर्ज किया गया. लेकिन तब तक देवेन्द्र ग्वालियर से दूर जा चुका था.
एफआईआर दर्ज होने के बाद वह पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहा. पुलिस उसकी तलाश में जुटी रही, जबकि वह कानपुर में छिपा हुआ था.
आरोपी की तलाश के दौरान क्राइम ब्रांच ने उसके संभावित ठिकानों और गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाई. विवेचना के दौरान पुलिस को तकनीकी माध्यम से उसके कानपुर में होने की सूचना मिली. इसके बाद ग्वालियर क्राइम ब्रांच की टीम कानपुर पहुंची और आरोपी की तलाश शुरू की.
पुलिस के मुताबिक, तलाश के दौरान आरोपी का ठिकाना पनकी थाना क्षेत्र स्थित वैष्णवी कुती में मिला. क्राइम ब्रांच की टीम ने दबिश देकर देवेन्द्र कुमार दुबे को गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद उसे ग्वालियर लाया गया और न्यायालय के समक्ष पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.
क्राइम ब्रांच अब इस बात की भी जांच कर रही है कि आरोपी ने कथित तौर पर फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र और बैंक स्टेटमेंट कैसे तैयार किए थे और इन दस्तावेजों को तैयार करने या इस्तेमाल करने में उसके साथ कोई अन्य व्यक्ति शामिल था या नहीं.
पुलिस यह भी पता लगा रही है कि दस्तावेजों का इस्तेमाल केवल अनंत टोयोटा में नौकरी हासिल करने के लिए किया गया था या इससे पहले भी कहीं और इसी तरह के दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया.
क्राइम ब्रांच थाना प्रभारी अमित शर्मा के मुताबिक, आरोपी ने फर्जी बैंक स्टेटमेंट और अनुभव प्रमाण पत्र के आधार पर कंपनी में नौकरी हासिल की थी. पुलिस ने उसे कानपुर से गिरफ्तार किया है और उससे पूछताछ की जा रही है.
पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी उसका इस्तीफा रहा. अगर मई 2026 में देवेन्द्र नौकरी नहीं छोड़ता या उसके बाद कंपनी की ओर से फुल एंड फाइनल सेटलमेंट के दौरान पुराने दस्तावेजों का सत्यापन नहीं किया जाता, तो फर्जीवाड़ा शायद कुछ और समय तक सामने नहीं आता.
एक तरफ कागजों में करीब 2.80 लाख रुपये मासिक वेतन पाने वाला अनुभवी अधिकारी, दूसरी तरफ उसी अनुभव के आधार पर ऑटोमोबाइल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट और फिर ग्रुप CEO की जिम्मेदारी, लेकिन जब पुराने रोजगार का सत्यापन हुआ तो पुलिस के मुताबिक उस कंपनी में नौकरी का रिकॉर्ड ही नहीं मिला.
अब ग्वालियर क्राइम ब्रांच इस पूरे फर्जीवाड़े की कड़ियां जोड़ने में जुटी है. जांच का अगला हिस्सा यह पता लगाने पर केंद्रित है कि फर्जी दस्तावेज कहां तैयार हुए, उनका इस्तेमाल किस तरह किया गया और इस प्रक्रिया में आरोपी के अलावा कोई और शामिल था या नहीं.

