राजस्थान निकाय चुनाव में ‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’! खरीद फरोख्त का खुला खेल, 10 हजार प्रत्याशी होटलों में लॉक

Direct Source Verification: This story is aggregated from India Today (indiatoday.in). Full reporting rights and copyright belong to the primary publisher.
राजस्थान निकाय चुनाव में बड़ी खबर सामने आई है. यहां निकाय चुनाव के बाद जीते हुए पार्षद कहीं 'गायब' बताए जा रहे हैं. सामने आया है कि कांग्रेस-बीजेपी समेत निर्दलीय जीते करीब दस हजार नव निर्वाचित पार्षद होटलों और रिसोर्ट में अलग-अलग जगहों पर बंद है. जनता ने भरोसा कर इन्हें चुन तो लि...

राजस्थान निकाय चुनाव में बड़ी खबर सामने आई है. यहां निकाय चुनाव के बाद जीते हुए पार्षद कहीं 'गायब' बताए जा रहे हैं. सामने आया है कि कांग्रेस-बीजेपी समेत निर्दलीय जीते करीब दस हजार नव निर्वाचित पार्षद होटलों और रिसोर्ट में अलग-अलग जगहों पर बंद है. जनता ने भरोसा कर इन्हें चुन तो लिया है मगर कांग्रेस-बीजेपी और छोटे दलों को अपने ही पार्षदों पर भरोसा नहीं है. 

हालात ऐसे रहे कि मतदान खत्म होते ही प्रत्याशी के मोबाइल ले लिए गए और वोटिंग के बाद उन्हें सीधे होटल पहुंचा दिया गया. प्रत्याशी मतगणना के दिन भी चुनावी मैदान से दूर होटल के कमरों से ही नतीजों पर नजर रखे रहे. यहां तक कि काउंटिंग के बाद इन्हें जीत का सर्टिफिकेट लेने के लिए भी नहीं जाने दिया गया. इनके एजेंटों ने जीत का सर्टिफ़िकेट लिया.

राजस्थान के 309 निकाय चुनावों में से बीजेपी को 85 निकायों में बहुमत मिला है तो वहीं कांग्रेस ने 45 निकाय में जीत दर्ज की है. बाकि 5 नगर निगम, 18 नगर परिषद और 122 नगरपालिकाओ में चाबी निर्दलियों के हाथ हैं. 34 निकायों में तो निर्दलियों ने बहुमत का आंकड़ा पार किया है.

ऐसे में पार्टी  नेताओं को डर था कि कहीं जीतने वाले पार्षदों पर दूसरे दलों की नजर न पड़ जाए और बोर्ड बनाने के समय कोई ‘खेला’ न हो जाए. इसी आशंका के चलते प्रत्याशियों को अलग-अलग होटलों में ठहराया गया. मतदान के बाद पार्षद अपने वार्ड में जनता के बीच कम और होटल की चारदीवारी में ज्यादा नजर आए.

पार्टियों की कोशिश सिर्फ अपने अधिकृत प्रत्याशियों तक सीमित नहीं रही. कई जगह निर्दलीय और बागी प्रत्याशियों को भी अपने पाले में लाने की कवायद हुई. जो प्रत्याशी चुनावी गणित में अहम माने जा रहे थे, उन्हें भी होटल की बाड़ेबंदी में शामिल कर लिया गया. जिन्हें लग्जरी होटलों में न सिर्फ अच्छे पकवान खिलाए गए बल्कि उनके मनोरंजन का भी ध्यान रखा गया है. 

इस पूरी बाड़ेबंदी का सबसे दिलचस्प पहलू निर्दलीय और बागी प्रत्याशियों को लेकर सामने आया. चुनाव से पहले या मतदान के बाद जिन निर्दलीय प्रत्याशियों को राजनीतिक दलों ने अपने संभावित ‘काम के चेहरे’ के तौर पर देखा, उन्हें भी अपने साथ होटल में रखा गया. वजह साफ थी बोर्ड बनाने के लिए एक-एक पार्षद की गिनती महत्वपूर्ण हो सकती है. 

जैसे ही नतीजे आए और इनमें से कुछ प्रत्याशी चुनाव हार गए तो कहानी भी बदल गई. जो कल तक पार्टी के ‘मेहमान’ थे, जीत की उम्मीद खत्म होते ही उनकी होटल वाली मेहमाननवाजी भी खत्म हो गई. हारने वाले निर्दलीय प्रत्याशियों को होटल से वापस घर भेज दिया गया, जबकि जीतने वाले या बोर्ड बनाने के समीकरण में उपयोगी माने जा रहे पार्षदों की बाड़ेबंदी अभी भी जारी है.

जयपुर में तो बाड़ेबंदी की यह तस्वीर और भी ज्यादा चर्चा में आ गई. एक होटल के बाहर का नजारा ऐसा था, जिसने पूरी ‘होटल पॉलिटिक्स’ की कहानी को कैमरे के सामने ला दिया. जिन निर्दलीय प्रत्याशियों को चुनाव के बाद लग्जरी बसों में होटल तक लाया गया था, नतीजे आने के बाद उनमें से हारने वाले प्रत्याशियों को वापस भेज दिया गया. दिलचस्प बात यह रही कि होटल तक पहुंचाने के लिए लग्जरी बस थी, लेकिन हार के बाद होटल के मुख्य गेट के बाहर पेड़ की छांव में बैठकर घर लौटने के लिए अपनी गाड़ी का इंतजार करते दिखे. 

दरअसल, नगर निकाय चुनाव में कई जगह मुकाबला बेहद करीबी रहा है. ऐसे में बोर्ड बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा जुटाना राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. यही वजह है कि जीतने वाले पार्षदों के साथ-साथ निर्दलीय और बागी प्रत्याशी भी अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं. किसी नगर निकाय में अगर बहुमत से एक-दो सीटें कम रह जाएं तो निर्दलीय पार्षदों की भूमिका किंगमेकर जैसी हो सकती है. 

ऐसे में चुनाव परिणाम आने के बाद शुरू होने वाली जोड़-तोड़ और समर्थन जुटाने की राजनीति से पहले ही पार्टियां अपने संभावित ‘नंबर गेम’ को सुरक्षित करने में जुट गईं. चुनाव परिणाम सामने आने के बाद अब असली सियासी परीक्षा शुरू हो गई है. रिपोर्टों के मुताबिक प्रत्याशियों को धार्मिक यात्रा और अन्य कार्यक्रमों के नाम पर बाहर ले जाया गया.

इसका मकसद संभावित दल-बदल और खरीद-फरोख्त से बचाना बताया गया. डूंगरपुर जिले की सागवाड़ा नगरपालिका में भी भाजपा और कांग्रेस ने अपने पार्षदों को सुरक्षित रखने की रणनीति अपनाई. रिपोर्टों के मुताबिक कांग्रेस के पार्षदों को माउंट आबू और भाजपा के पार्षदों को उदयपुर ले जाया गया.

सीकर में भी मतदान के बाद बाड़ेबंदी की खबरें सामने आई थीं. कांग्रेस के प्रत्याशियों को पहले एक मैरिज गार्डन में एकत्र किया गया और बाद में उन्हें शहर से बाहर ले जाने की जानकारी सामने आई. भाजपा की ओर से भी प्रत्याशियों को जयपुर ले जाने की खबरें सामने आई थीं.

राजस्थान के कई अन्य नगर निकायों में भी प्रत्याशियों को होटल, रिसॉर्ट या दूसरे सुरक्षित स्थानों पर रखने की खबरें सामने आई हैं. लेकिन अधिकांश जगहों पर पार्टियों ने सटीक होटल या रिसॉर्ट का नाम सार्वजनिक नहीं किया है.

निकाय चुनाव में पार्षदों के नतीजे आने के बाद अब असली मुकाबला बोर्ड बनाने का है. कई नगर निकायों में भाजपा और कांग्रेस बहुमत के करीब हैं, लेकिन निर्दलीय पार्षदों की संख्या ऐसी है कि वे बोर्ड गठन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. इसी वजह से पार्टियों की कोशिश है कि उनके जीते हुए पार्षद दूसरे खेमे के संपर्क में न आएं. चुने हुए पार्षदों को शपथ दिलाने के लिए निकाय दफ्तर में बसों में बैठाकर लाया जा रहा है और वापस बस से रिजॉर्ट में लेकर जा रहे हैं. 

अलवर में तो एक निर्वाचित पार्षद को पुलिस उठा ले गई जिसके बाद व्यापारियों ने बाजार बंद कर दिया. बाद में वह केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव से मिलने दिल्ली पहुंचा.कांग्रेस आरोप लगा रही है कि जहां उनके पार्षद रखे गए हैं वहाँ पुलिस जबरन होटल में घुसकर जांच कर रही है और पार्षदों को उठाकर ले जा रही है. यह भी आरोप है कि निर्दलीय पार्षदों के घर पुलिस रेड डाल रही है. महापौर और सभापति चुनाव 21 सितंबर को होना है. ऐसे में आने वाले दिनों में बाड़ेबंदी और तेज होने की संभावना है.

Original Source
https://www.aajtak.in/rajasthan/story/rajasthan-municipal-elections-councillors-confinement-political-strategy-board-formation-ntcpvp-rptc-2643389-2026-09-15?utm_source=rss
Visit India Today ↗
SHARE STORY:
𝕏 f in

Related Coverage in World