उत्तराखंड की 13 झीलों पर मंडरा रहा GLOF का खतरा, वसुंधरा ताल से शुरू हुई 24 घंटे निगरानी
उत्तराखंड के चमोली जिले में मौजूद वसुंधरा ताल पर ग्लेशियल झील से आने वाली बाढ़ यानी GLOF के खतरे पर नजर रखने के लिए अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाया जा रहा है. यह उत्तराखंड में किसी ग्लेशियल झील पर लगाया जाने वाला पहला ऐसा सिस्टम है. इसका काम झील में पानी के स्तर और आसपास हो रहे बदलावों पर लगातार नजर रखना है.
उत्तराखंड स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (USDMA) की देखरेख में यह अभियान 15 अक्टूबर तक चलेगा. इसके लिए वैज्ञानिकों और तकनीकी एक्सपर्ट्स की टीम देहरादून से वसुंधरा ताल के लिए रवाना हुई है. इस टीम में रुड़की के सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CBRI) और देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक और एक्सपर्ट्स शामिल हैं. SDRF, NDRF और ITBP के जवान भी टीम के साथ हैं.
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वसुंधरा ताल उन 13 ग्लेशियल झीलों में शामिल है, जिन्हें नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) और तकनीकी संस्थानों ने हाई रिस्क वाली झील माना है. अगर किसी ग्लेशियल झील से अचानक बहुत ज्यादा पानी बाहर निकल जाए तो नीचे के इलाकों में तेज बाढ़ आ सकती है. इसी खतरे को देखते हुए इन झीलों की निगरानी बढ़ाई जा रही है.
GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड तब होता है, जब ग्लेशियर के पास बनी झील का पानी अचानक बाहर निकल जाता है. इससे नीचे की तरफ पानी बहुत तेजी से जा सकता है और बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है. ग्लेशियल झीलों में ग्लेशियर का पिघला पानी जमा होता है. अगर ज्यादा बर्फ पिघले या भारी बारिश हो तो झील में पानी बढ़ सकता है. भूस्खलन या झील को रोकने वाली बर्फ और मिट्टी की दीवार में बदलाव से भी खतरा बढ़ सकता है.
वसुंधरा ताल पर लगाए जा रहे सिस्टम में सेंसर, सैटेलाइट कम्युनिकेशन और रियल टाइम डेटा मॉनिटरिंग का इस्तेमाल होगा. सेंसर झील और उसके आसपास की स्थिति से जुड़ी जानकारी जुटाएंगे. इस जानकारी को लगातार देखा जाएगा, ताकि झील में कोई बड़ा बदलाव होने पर उसका पता जल्दी चल सके.
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हिमालय के ऊंचे इलाकों में कई जगह मोबाइल नेटवर्क और सामान्य कम्युनिकेशन की सुविधा नहीं होती. ऐसे में सैटेलाइट के जरिए डेटा भेजना काम आएगा. इससे वैज्ञानिक और प्रशासन झील की स्थिति पर दूर से भी नजर रख सकेंगे.
नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर यानी NRSC के 2023 के आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड में 344 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है. इनमें से 13 झीलों को हाई रिस्क वाली झील माना गया है. इनमें पिथौरागढ़ की 6, चमोली की 4 और बागेश्वर, टिहरी और उत्तरकाशी की एक-एक झील शामिल है.
इन 13 झीलों में से 6 का बैथीमेट्रिक सर्वे पूरा हो चुका है. इसमें चमोली की सरस्वती ताल और वसुंधरा ताल, उत्तरकाशी की केदारताल और पिथौरागढ़ की माबांग, प्यूनग्रु और स्यूक्ति यांक्ती झील शामिल हैं. इस सर्वे से झील की गहराई और उसमें मौजूद पानी के बारे में जानकारी मिलती है.
वसुंधरा ताल से शुरू हुआ यह काम उत्तराखंड की ग्लेशियल झीलों पर निगरानी बढ़ाने की योजना का हिस्सा है. राज्य सरकार के मुताबिक वैज्ञानिक संस्थानों, एक्सपर्ट्स और आपदा प्रबंधन से जुड़े विभागों के साथ मिलकर हाई हिमालयी इलाकों में ऐसे सिस्टम को और मजबूत किया जाएगा.
इससे ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलावों को समय पर समझने में मदद मिलेगी. अगर किसी झील में खतरे की स्थिति बनती है तो उससे जुड़े विभागों को पहले जानकारी मिल सकेगी और जरूरी कदम उठाने के लिए ज्यादा समय मिल सकता है.