₹2,814 करोड़ की स्कीम, लगेंगे 4 प्लांट... भारत क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग में खत्म करेगा चीन का दबदबा!
इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी हो या मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक तकनीक, इन सबके लिए कुछ खास खनिज बेहद जरूरी हैं. लेकिन इन खनिजों को निकालने के बाद इस्तेमाल लायक बनाने यानी प्रोसेसिंग के मामले में भारत अब भी दूसरे देशों पर निर्भर है. इस क्षेत्र में चीन का दबदबा है. अब इस निर्भरता को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में ₹2,814 करोड़ की 'क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग स्कीम' को मंजूरी दी गई. इसके तहत देश में लिथियम और निकेल के चार प्रोसेसिंग प्लांट लगाए जाएंगे. सरकार योग्य निवेश पर 30 फीसदी तक पूंजीगत सब्सिडी देगी. इससे भारत में इन खनिजों की प्रोसेसिंग बढ़ेगी, आयात पर निर्भरता घटेगी और भविष्य की तकनीक से जुड़े उद्योगों को देश में ही जरूरी कच्चा माल मिलने का रास्ता खुलेगा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना की मंजूरी के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि क्या भारत को उन क्रिटिकल मिनरल की प्रोसेसिंग के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना चाहिए, जो भविष्य की तकनीक को ताकत देते हैं? उन्होंने कहा कि वह ऐसा बिल्कुल नहीं मानते. पीएम मोदी ने लिथियम, निकेल और कोबाल्ट को इलेक्ट्रिक व्हीकल, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्र के लिए जरूरी बताया. उन्होंने कहा कि भारत अभी रिफाइंड सामग्री के आयात पर काफी निर्भर है. इस निर्भरता को बदलने के लिए कैबिनेट ने नई योजना को मंजूरी दी है. प्रधानमंत्री के मुताबिक, योजना के तहत नए प्रोसेसिंग प्लांट लगाए जाएंगे, निवेश को बढ़ावा देने के लिए पूंजीगत सब्सिडी दी जाएगी, देश में वैल्यू एडिशन बढ़ाया जाएगा और सप्लाई चेन मजबूत होगी. उनका कहना है कि भविष्य की तकनीक बनाने के लिए भारत के पास अपनी क्षमता होनी चाहिए.
क्रिटिकल मिनरल यानी ऐसे जरूरी खनिज, जिनकी सप्लाई में रुकावट आने से देश की अर्थव्यवस्था, उद्योग, ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं. लिथियम, निकेल, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ जैसे खनिज इसी श्रेणी में आते हैं. इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV), बैटरी, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, पवन ऊर्जा और रक्षा उपकरणों में होता है. इन खनिजों की प्रोसेसिंग दुनिया के कुछ ही देशों में बड़े पैमाने पर होती है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, रेयर अर्थ और बैटरी-ग्रेड ग्रेफाइट की ग्लोबल रिफाइनिंग में चीन की हिस्सेदारी 90 फीसदी से ज्यादा है.
यानी खनिज दुनिया के किसी भी हिस्से से निकले, उसे बैटरी या दूसरी तकनीक में इस्तेमाल करने लायक बनाने के लिए कई बार चीन की प्रोसेसिंग क्षमता पर निर्भर रहना पड़ता है. इस निर्भरता का खतरा तब बढ़ जाता है, जब किसी देश में राजनीतिक तनाव, निर्यात पर पाबंदी या सप्लाई में रुकावट आती है. इससे कंपनियों को कच्चा माल मिलने में देरी हो सकती है और उसकी कीमतें भी बढ़ सकती हैं. भारत भी रिफाइंड और हाई-प्योरिटी मिनरल सामग्री के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है. ऐसे में सरकार अब देश के भीतर ही प्रोसेसिंग का मजबूत ढांचा तैयार करना चाहती है.
क्या है सरकार की ₹2,814 करोड़ की स्कीम?
केंद्र सरकार ने इस योजना का नाम 'कैपेक्स सपोर्ट स्कीम टू प्रमोट क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग' रखा है. कैपेक्स यानी Capital Expenditure का मतलब किसी प्लांट, मशीनरी और दूसरे बुनियादी ढांचे को तैयार करने पर होने वाला पूंजीगत खर्च है. इस योजना के तहत सरकार देश में चार क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग प्लांट लगाने के लिए योग्य निवेश पर 30 फीसदी पूंजीगत सब्सिडी देगी. इनमें दो प्लांट लिथियम की प्रोसेसिंग के लिए और दो निकेल की प्रोसेसिंग के लिए होंगे.
योजना का कुल बजट ₹2,814 करोड़ रखा गया है और इसे वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक पांच साल में लागू किया जाएगा. योजना का मकसद सिर्फ प्लांट लगाना नहीं है. सरकार चाहती है कि भारत में कच्चे खनिजों और उनके शुरुआती उत्पादों को प्रोसेस करके हाई-प्योरिटी कंपाउंड तैयार किए जाएं. यानी खनिजों की वैल्यू बढ़ाने वाला काम भी देश में हो, जिससे तैयार सामग्री के लिए विदेशों पर निर्भरता कम की जा सके.
लिथियम और निकेल के कितने बड़े प्लांट लगेंगे?
योजना के तहत चार प्लांट की क्षमता भी तय की गई है. हर प्लांट की न्यूनतम प्रोसेसिंग क्षमता इस तरह होगी... लिथियम के 2 प्लांट: प्रत्येक की न्यूनतम क्षमता 30 किलोटन (30,000 टन) होगी. निकेल के 2 प्लांट: प्रत्येक की न्यूनतम क्षमता 50 किलोटन (50,000 टन) होगी. लिथियम और निकेल के अयस्कों या शुरुआती प्रोसेसिंग से तैयार इंटरमीडिएट उत्पादों को इन प्लांट में प्रोसेस करके हाई-प्योरिटी कंपाउंड में बदला जाएगा. ये ऐसे उत्पाद होंगे, जिनका इस्तेमाल बैटरी और अन्य औद्योगिक जरूरतों में किया जा सकता है. इस प्रक्रिया में निकेल के उत्पादन के दौरान कोबाल्ट भी सह-उत्पाद (By-product) के रूप में हासिल होने की उम्मीद है. कोबाल्ट भी लिथियम-आयन बैटरी बनाने में इस्तेमाल होने वाला अहम खनिज है. इस तरह निकेल प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ने से कोबाल्ट की घरेलू उपलब्धता को भी मदद मिल सकती है.
सरकार योग्य निवेश का 30 फीसदी हिस्सा पूंजीगत सब्सिडी के तौर पर देगी. हालांकि, हर परियोजना के लिए अधिकतम सरकारी मदद की सीमा भी तय की गई है. अगर कोई कंपनी लिथियम प्रोसेसिंग के 2 प्लांट लगाती है, तो प्रति प्लांट न्यूनतम प्रोसेसिंग क्षमता 30,000 टन रखी गई है और इसके लिए अधिकतम सरकारी मदद ₹500 करोड़ होगी. इसी तरह निकेल प्रोसेसिंग के लिए प्रति प्लांट 50,000 टन क्षमता रखी गई है और इसके लिए अधिकतम सरकारी मदद ₹900 करोड़ होगी. यह अधिकतम सीमा है, हर कंपनी को इतनी रकम मिलना तय नहीं है. वास्तविक मदद योग्य निवेश और योजना की शर्तों के मुताबिक होगी.
इस योजना का लाभ लेने वाली कंपनियों का चयन दो चरणों में किया जाएगा. पहले चरण में टेक्निकल योग्यता की जांच होगी. सबसे पहले आवेदन करने वाली कंपनियों की तकनीकी क्षमता और पात्रता जांची जाएगी. सिर्फ वही कंपनियां अगले चरण में पहुंचेंगी, जो तय तकनीकी शर्तों को पूरा करेंगी. दूसरे चरण में फाइनेंशियल बिडिंग होगी. तकनीकी रूप से योग्य कंपनियों को वित्तीय बोली लगाने का मौका मिलेगा.
हर खनिज के लिए दो-दो लाभार्थी चुने जाएंगे. चयन में उन कंपनियों को प्राथमिकता मिलेगी, जो प्लांट लगाने के लिए सरकार से सबसे कम पूंजीगत सहायता मांगेंगी. इसे Least-Cost Criterion कहा गया है. सरकार की ओर से मिलने वाली आर्थिक मदद एक साथ नहीं दी जाएगी. इसे तीन किस्तों में जारी किया जाएगा. हर किस्त संबंधित कंपनी के तय प्रोजेक्ट माइलस्टोन (Milestones) पूरे करने से जुड़ी होगी. यानी प्लांट लगाने और परियोजना को आगे बढ़ाने में हुई प्रगति के आधार पर सहायता मिलेगी.
इस योजना का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि भारत क्रिटिकल मिनरल की सप्लाई चेन में सिर्फ आयात करने वाला बाजार बनकर न रहे, बल्कि प्रोसेसिंग के स्तर पर भी अपनी क्षमता विकसित करे. इसके कई फायदे होंगे.
1. आयात पर निर्भरता घटेगी: अभी भारत को लिथियम, निकेल और कोबाल्ट जैसे खनिजों से तैयार हाई-प्योरिटी सामग्री के लिए विदेशों से खरीद करनी पड़ती है. देश में प्रोसेसिंग प्लांट बनने से ऐसी सामग्री का कुछ हिस्सा भारत में ही तैयार किया जा सकेगा. इससे आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी.
2. चीन पर निर्भरता कम करने का विकल्प मिलेगा: क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग में चीन की बड़ी हिस्सेदारी है. अगर वहां से सप्लाई बाधित होती है या निर्यात पर पाबंदी लगती है, तो दूसरे देशों के उद्योग प्रभावित हो सकते हैं. भारत में अपनी प्रोसेसिंग क्षमता बनने से घरेलू कंपनियों को सप्लाई का एक वैकल्पिक स्रोत मिलेगा और देश की सप्लाई चेन मजबूत होगी.
3. EV और बैटरी उद्योग को मदद: लिथियम और निकेल इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी के लिए अहम हैं. भारत में इलेक्ट्रिक कारों और दूसरे इलेक्ट्रिक वाहनों का बाजार बढ़ने के साथ बैटरी की मांग भी बढ़ रही है. घरेलू प्रोसेसिंग से बैटरी बनाने वाली कंपनियों को जरूरी सामग्री देश में उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है.
4. ऊर्जा भंडारण की क्षमता बढ़ेगी: बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) में बड़ी बैटरियों का इस्तेमाल होता है. ये सिस्टम सौर और पवन ऊर्जा से बनी बिजली को स्टोर करने और जरूरत के समय इस्तेमाल करने में मदद करते हैं. ऐसे सिस्टम के विस्तार के लिए भी बैटरी से जुड़े खनिज जरूरी हैं. इसलिए घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ने से भारत के ऊर्जा भंडारण क्षेत्र को सपोर्ट मिल सकता है.
5. इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्र को फायदा: मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, विशेष औद्योगिक मशीनों और रक्षा से जुड़े कई उपकरणों में क्रिटिकल मिनरल का इस्तेमाल होता है. देश में इनकी प्रोसेसिंग बढ़ने से ऐसे उद्योगों को जरूरी सामग्री की सप्लाई मजबूत करने में मदद मिल सकती है.
6. देश में निवेश और वैल्यू एडिशन बढ़ेगा: खनिजों को सिर्फ निकालना ही नहीं, बल्कि उन्हें साफ करके उच्च गुणवत्ता वाले औद्योगिक उत्पादों में बदलना भी बड़ा कारोबार है. प्रोसेसिंग प्लांट लगने से इस क्षेत्र में निवेश, तकनीक और विशेषज्ञता विकसित हो सकती है. इससे खनिजों की वैल्यू का बड़ा हिस्सा देश के भीतर ही तैयार करने का मौका मिलेगा.


