29 किमी लंबा... 3000 KM दूर, 'Bob-El-Mandeb' स्ट्रेट भारत के लिए क्यों है खास?
भारत के लिए एक बड़ा संकट सामने नजर आ रहा है. हालांकि, ये करीब 3000 किलोमीटर दूर है, लेकिन देश के लिए बड़ी मुसीबत का सबब बन सकता है. हम बात कर रहे हैं बाब-अल-मंदेब की, यमन के लाल सागर तट पर लगभग 18 घंटे तक चले भीषण हमले ने ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को इस जरूरी समुद्री रास्ते पर नियंत्रण के करीब पहुंचा दिया है.
दुनिया के अन्य देशों के साथ ही भारत के लिए यह मामला खासतौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत कच्चे तेल और अन्य पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के आयात के साथ-साथ यूरोप तक पहुंचने के लिए भी Bob-El-Mandeb Strait पर निर्भर है. इसमें रुकावट से देश में पेट्रोल-डीजल से लेकर एलपीजी तक की कीमतों में बड़ा असर देखने को मिल सकता है.
क्या बढ़ने वाला है तेल का संकट? हूती विद्रोही का बाब अल-मंडेब पर कब्जा भारत को तेल की महत्वपूर्ण आपूर्ति को बाधित कर सकता है. ये पहले से ही अमेरिका- ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से खाड़ी देशों से पेट्रोलियम शिपमेंट में पहले ही काफी व्यवधान का सामना कर रहा है. Bob El Mandeb हमेशा से तेल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों के लिए एक महत्वपूर्ण ग्लोबल मरीन रूट रहा है. सऊदी अरब का तेल, जेद्दा और यानबू सहित पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाहों से टैंकरों में लादकर, बाब अल-मंदेब के रास्ते अरब सागर में एशियाई बाजारों तक पहुंचता है.
3000 Km दूर 29 किलोमीटर का रास्ता बता दें कि बाब अल-मंदेब यमन और जिबूती के बीच लाल सागर पर स्थित 29 किलोमीटर लंबा एक संकरा समुद्री रूट है, जो स्वेज नहर के जरिए भूमध्य सागर को हिंद महासागर और उससे आगे जोड़ता है. रिफाइंड फ्यूल, दवाइयां, मशीनरी और अन्य वस्तुओं का परिवहन करने वाले जहाज नियमित रूप से नीदरलैंड के रॉटरडैम और फ्रांस के मार्सिले जैसे बड़े यूरोपीय पोर्ट्स तक पहुंचने के लिए इस स्ट्रेट का इस्तेमाल करते हैं.
बाब अल-मंडेब से भी दुनिया के कुल समुद्री तेल और गैस व्यापार का लगभग 5% से 12% हिस्सा यानी 4 से 5 मिलियन बैरल हर दिन तेल सप्लाई होता है. साफ शब्दों में समझें, तो होर्मुज की तरह ही बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट (Bab-el-Mandeb Strait) भी एक महत्वपूर्ण चोकपॉइंट है और ये समुद्री रूट लाल सागर (Red Sea) को अदन की खाड़ी (Gulf of Aden) के साथ ही हिंद महासागर से जोड़ता है. अगर इस रास्ते में रुकावट आती है तो ग्लोबल शिपिंग बाधित हो सकती है. कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और ऐसा होना भारत के लिए भी ये परेशानी का सबब बन सकता है.
200 डॉलर पहुंच सकता है तेल! बॉब अल मंदेब पर संकट पहली बार नहीं है बीते दिनों भी ये खूब सुर्खियों में रहा था. दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रूट्स में से एक ये स्ट्रेट स्वेज नहर के साउथ एंट्री गेट के तौर पर भी काम करता है और ग्लोबल मरीन ट्रेड का करीब 10 से 12 फीसदी हिस्से के लिए जिम्मेदार है. इसमें एनर्जी शिपमेंट का बड़ा हिस्सा है. पिछले दिनों ईरानी मीडिया अल-फराह के हवाले से कुछ रिपोर्ट्स में अनुमान जाहिर करते हुए कहा गया था कि इस रूट में रुकावट आती है, तो फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं.
क्यों भारत के लिए परेशानी का सबब? बाब-अल-मंदेब भारत के लिए कैसे खास है इसे समझ लेना जरूरी है. दरअसल, भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा तेल आयात करता है और होर्मुज स्ट्रेट के बाद Crude Oil-LNG के आयात के लिए वेस्ट एशिया के साथ ही उत्तरी अफ्रीका के कुछ हिस्सों पर निर्भर है. भारत के लिए यमन के कंट्रोल वाला यह समुद्री रूट होर्मुज की तरह ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्राइवेट और पब्लिक भारतीय रिफाइनर्स रोजाना इस रास्ते से यूरोपीय खरीदारों को रिफाइन पेट्रोलियम उत्पाद भेजते हैं.
भारत के लगभग 95% व्यापार का संचालन समुद्र के रास्ते होता है, ऐसे में बाब अल-मंडेब यूरोप, उत्तरी अमेरिका और उत्तरी अफ्रीका को निर्यात के लिए अहम एंट्री गेट बन जाता है. स्वेज नहर और बाब अल-मंडेब स्ट्रेट मिलकर भारत के कुल विदेशी व्यापार का लगभग 35% हिस्से को संभालते हैं. वस्त्र, परिधान, दवाइयां, मशीनरी और बासमती चावल समेत कृषि उत्पाद जैसे थोक निर्यात इसी मार्ग से होकर गुजरते हैं. यूरोप को निर्यात होने वाले भारतीय माल का लगभग 80% हिस्सा लाल सागर क्षेत्र से होकर गुजरता है.