AK-47, ग्रेनेड और लॉन्चर... हूतियों के सपोर्ट में पहाड़ों से उतरा बनी हशीश कबीला, सऊदी को एक और चैलेंज!
पहाड़ों से उतरते हथियारबंद लड़ाकों का एक कारवां मरीब की ओर बढ़ रहा है. कंधे पर लोडेड रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड है, कुछ हाथों ने AK-47 थाम रखे हैं. इस दस्ते में युवा हैं, अधेड़ हैं और तो और 8-10 के बच्चे भी हैं. रेगिस्तान की मिट्टी में धूल का गुबार उठ रहा है. छह सात सौ साल पहले चले जाएं तो कभी इसी तरह अरब की रेत पर सेनाएं निकलती थी. घोड़े, ऊंट, परचम, हथियार और फतह का इरादा लेकर. मध्य काल से लेकर आजतक यमन की इस जमीन पर जंग को लेकर ज्यादा कुछ नहीं बदला है. ज्यादातर लड़ाके आज भी पैदल हैं, पैरों में चप्पल है, परंपरागत पोशाक जाम्बिया पहनकर ये सैनिक सऊदी अरब के खिलाफ जंग के लिए निकल पड़े हैं.
फर्क सिर्फ इतना है कि आज न घोड़ों की टापें हैं, न तलवारों की चमक. उनकी जगह पिकअप ट्रक, मशीनगनें और आधुनिक हथियार हैं. यह यमन के बनी हशीश कबीला के लड़ाकों की लामबंदी है, जो यमन की राजधानी सना के पूर्वी पहाड़ों से निकलकर मरीब की तरफ बढ़ रही है.
बनी हशीश के इस मार्च को इसलिए सिर्फ एक सैन्य काफिले की तरह देखना भूल होगी. यह उस यमन की तस्वीर है जहां आधुनिक मिसाइलों और ड्रोन के बीच भी सदियों पुरानी कबीलाई ताकत सऊदी शासकों को थर्रा रही है.
बनी हशीश यमन का एक प्रमुख और पुराना कबीलाई समूह है. इसका इलाका राजधानी सना के पूर्व में पहाड़ी क्षेत्र में फैला हुआ है. सना के बेहद करीब होने के कारण इस कबीले का रणनीतिक महत्व काफी ज्यादा है. यहां से राजधानी के पूर्वी रास्तों और आसपास के इलाकों पर प्रभाव रखा जा सकता है.
قبائل بني حشيش تتجهز وتنتظر التوجيهات لاستكمال تحرير ماتبقى من الأراضي اليمنية ومأرب على رأس القائمة وبإذن الله سوف نشاهد انسحاب تكتيكي جديد في مأرب. pic.twitter.com/yTNQKLgAHH
यमन में कबीलों की भूमिका सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सैन्य भी रही है. बनी हशीश भी इसका उदाहरण है. 2000 के दशक में इस कबीले के कुछ हिस्सों और हूती आंदोलन के बीच लड़ाई हुई थी. लेकिन 2014 में हूतियों के सना पर कब्जे के बाद समीकरण बदल गए और बनी हशीश के बड़े हिस्से हूती नियंत्रण में आ गए.
आज कबीले के कई प्रभावशाली लोग और लड़ाके हूती नेटवर्क के साथ जुड़े हुए है. हूती नेतृत्व के लिए बनी हशीश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजधानी सना के नजदीक है और यहां से बड़ी संख्या में लोगों को लामबंद किया जा सकता है.
2000 के दशक में जब हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूती के नेतृत्व में आंदोलन उभर रहा था और 2004 के बाद जब हूती विद्रोह शुरू हुआ, तब उत्तरी यमन की कई जनजातियों की तरह बनी हशीश भी बदलते राजनीतिक समीकरणों में फंसे थे. हूती आंदोलन मूल रूप से सद्दा और उत्तरी यमन के जायदियों के बीच धार्मिक आंदोलन के रूप में उभरा था, लेकिन बाद में उसने व्यापक राजनीतिक और सैन्य रूप ले लिया.
बनी हशीश का हूतियों से सबसे महत्वपूर्ण टकराव 2008-09 के आसपास देखने को मिला. उस समय हूती लड़ाकों और बनी हशीश के कुछ हिस्सों के बीच गंभीर लड़ाई हुई.
लेकिन फिर 2014 में तस्वीर बदल गई. जब हूतियों ने 2014 में सना पर कब्जा किया, तब उनका सैन्य और राजनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ा. उस दौर में उन्होंने सना के आसपास की जनजातियों को या तो साथ लिया या अपने नियंत्रण में ले लिया.
इसी प्रक्रिया में बनी हशीश भी हूतियों के अधीन आ गया.
यही कारण है कि आज जब हूती मीडिया बनी हशीश के मोबिलाइजेशन की तस्वीरें जारी करता है तो वह केवल स्थानीय जनसभा नहीं होती. वह यह संदेश भी होता है कि सना के आसपास की जनजातियां हूती सैन्य ढांचे के साथ खड़ी हैं.
मरीब यमन के उत्तर-मध्य हिस्से में स्थित है और राजधानी सना से करीब 175 किलोमीटर पूर्व में है. इसके पश्चिम में सना, उत्तर में अल-जौफ, दक्षिण में अल-बैदा और शबवा और पूर्व में हद्रमौत है. यानी नक्शे पर देखें तो मरीब सना और यमन के पूर्वी रेगिस्तानी इलाकों के बीच एक रणनीतिक पुल जैसा है.
लेकिन मरीब की असली अहमियत उसके तेल और गैस में है. 1980 के दशक में यहां यमन के बड़े व्यावसायिक तेल भंडार मिले. यहां गैस और तेल के अलावा देश का एक महत्वपूर्ण बिजली संयंत्र भी है. मरीब, शबवा और हद्रमौत को मिलाकर यमन का प्रमुख तेल-गैस बेल्ट बनता है.
दूसरी बड़ी वजह है भूगोल और सत्ता. मरीब लंबे समय से हूतियों के विरोधी यमनी सरकार और स्थानीय कबीलों का मजबूत गढ़ रहा है. हूतियों के लिए इस पर कब्जा होने का मतलब होगा, सना के पूर्व में अपनी पकड़ मजबूत करना, ऊर्जा संसाधनों तक पहुंच बनाना और सरकार के सबसे महत्वपूर्ण गढ़ों में से एक को तोड़ना.
मरीब की तरफ बढ़ रहा बनी हशीश का यह कारवां सिर्फ हथियारबंद लोगों की मूवमेंट नहीं है. इसके पीछे तेल-गैस और सत्ता, तीनों दांव पर हैं. 2021 में भी हूती सेना ने मरीब पर कब्जे के लिए बड़ा अभियान चलाया था, लेकिन स्थानीय कबीलों और सरकार समर्थक बलों ने उनका मुकाबला किया था.
अब 2026 में हालात फिर तेजी से बदल रहे हैं. हूतियों ने पश्चिमी यमन में बड़े इलाके और रणनीतिक बंदरगाहों पर बढ़त बनाई है, जबकि दूसरी तरफ सऊदी समर्थित यमनी बल जवाबी दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
बनी हशीश की लामबंदी सऊदी के लिए टेंशन क्यों?
बनी हशीश कबीले के लड़ाकों के सहारे भले ही हूती विद्रोही मरीब शहर पर कब्जा करना चाहते हैं. लेकिन इससे असल चिंता सऊदी अरब को हो रहा है. मरीब शहर पर अभी सऊदी समर्थित यमन की सरकारी सेना का कब्जा है.
दरअसल मरीब सना और सऊदी सीमा के बीच रणनीतिक गलियारे में आता है. सबसे बड़ा खतरा यह है कि मरीब पर दबाव बढ़ने से हूतियों को यमन के तेल-गैस संसाधनों और सऊदी सीमा की ओर जाने वाले रास्तों पर बेहतर स्थिति मिल सकती है. मरीब लंबे समय से हूती विरोधी ताकतों का प्रमुख गढ़ रहा है और सऊदी अरब ने वहां सरकार समर्थक बलों को महत्वपूर्ण समर्थन दिया है.
अगर हूती मरीब पर कब्जा कर लेते हैं तो सऊदी अरब के लिए यह बड़ा रणनीतिक झटका होगा. इसके हाथ से निकलने पर हूतियों की सना के पूर्व में पकड़ मजबूत होगी और उन्हें ऊर्जा संसाधनों पर ज्यादा नियंत्रण मिल सकता है. इससे सऊदी सीमा की तरफ हूतियों का रणनीतिक दबाव भी बढ़ेगा. सबसे बड़ी चिंता यह होगी कि सऊदी के खिलाफ मिसाइल और ड्रोन हमलों के लिए हूतियों का ऑपरेशनल स्पेस और संसाधन दोनों बढ़ सकते हैं. यानी मरीब का नुकसान सिर्फ यमन का नहीं, सऊदी की सुरक्षा का भी सवाल बन जाएगा.


