Asian Games: 800 करोड़ की तैयारी, 17 मेडल... सोना आया तो सिर्फ 1, नागोया ने भारत की खेल ताकत पर बड़ा सवाल खड़ा किया

Direct Source Verification: This story is aggregated from India Today (indiatoday.in). Full reporting rights and copyright belong to the primary publisher.
भारत ने एशियन गेम्स की तैयारी में इस बार पैसा बहाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पिछले तीन साल में खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर, उपकरण, कोचिंग और विशेषज्ञों की सेवाओं पर 702.86 करोड़ रुपये खर्च किए गए. इसके अलावा 97.84 करोड़ रुपये टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) के...

भारत ने एशियन गेम्स की तैयारी में इस बार पैसा बहाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. पिछले तीन साल में खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर, उपकरण, कोचिंग और विशेषज्ञों की सेवाओं पर 702.86 करोड़ रुपये खर्च किए गए. इसके अलावा 97.84 करोड़ रुपये टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) के जरिए लगाए गए. यानी तैयारी पर सरकारी निवेश 800.70 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.

तुलना दिलचस्प है. 2022-23 में कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स की तैयारी के लिए खेल मंत्रालय ने ₹190 करोड़ खर्च करने का प्रावधान किया था. अब तीन साल की तैयारी में करीब ₹800 करोड़ का निवेश हो चुका है.

अब सवाल बिल्कुल सीधा है- इतने निवेश के बाद नागोया में भारत की असली तस्वीर कैसी दिख रही है?

24 सितंबर तक भारत के खाते में 1 गोल्ड, 7 सिल्वर और 9 ब्रॉन्ज यानी कुल 17 पदक हैं. कुल संख्या सुनने में खराब नहीं लगती, लेकिन मेडल टेबल पर नजर डालते ही बेचैनी बढ़ जाती है. भारत 14वें स्थान पर है. चीन 78 गोल्ड समेत 126 पदकों के साथ सबसे ऊपर है. जापान के पास 20 गोल्ड समेत 89 और दक्षिण कोरिया के पास 10 गोल्ड समेत 50 पदक हैं. भारत के खाते में अभी सिर्फ एक गोल्ड है.

यही नागोया की सबसे बड़ी कहानी है. मेडल मिल रहे हैं, लेकिन गोल्ड की भूख वैसी नहीं दिख रही.

भारत पोडियम तक पहुंच रहा है, सिल्वर और ब्रॉन्ज जीत रहा है, लेकिन सबसे ऊपर पहुंचने की रफ्तार बेहद धीमी है. और एशियन गेम्स में यही अंतर किसी देश की खेल ताकत का असली पैमाना बनता है.

2023 के हांगझोउ एशियन गेम्स में भारत ने इतिहास रचा था. पहली बार 100 का आंकड़ा पार करते हुए 106 पदक- 28 गोल्ड, 38 सिल्वर और 40 ब्रॉन्ज जीते. भारत चौथे स्थान पर रहा और उसका सर्वश्रेष्ठ एशियाई खेल अभियान सामने आया. इससे पहले भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2018 जकार्ता में 70 पदकों का था.

यानी हांगझोउ सिर्फ एक अच्छा प्रदर्शन नहीं था. उसने भारतीय खेलों की उम्मीदों की छत ही बदल दी. अब समस्या यह है कि 106 के बाद 100+ पदक सामान्य उम्मीद बन गए हैं.

नागोया में गेम्स अभी खत्म नहीं हुए हैं. इसलिए अंतिम आंकड़े पर फैसला सुनाना जल्दबाजी होगा. भारत के पास अभी कई ऐसे खेल हैं जहां पदक आने बाकी हैं. लेकिन शुरुआती रफ्तार ने एक असहज सवाल जरूर खड़ा कर दिया है- हांगझोउ में भारत ने 28 गोल्ड जीते थे... नागोया में अभी सिर्फ 1?

यह तुलना अपने आप में पूरी कहानी नहीं बताती, क्योंकि प्रतियोगिता अभी जारी है. लेकिन यह जरूर बताती है कि पिछली बार भारत जिन खेलों में सोना निकाल रहा था, उनमें इस बार वही दबदबा शुरुआती दिनों में नजर नहीं आया.

भारत का इकलौता गोल्ड... वह भी महिला क्रिकेट टीम ने जीता है. टीम ने श्रीलंका को 147 रनों से हराकर लगातार दूसरी बार एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक अपने नाम किया.

इसके बाद सिल्वर और ब्रॉन्ज की संख्या बढ़ती गई. यानी सवाल यह नहीं कि भारत खाली हाथ लौट रहा है. बिल्कुल नहीं. सवाल इससे बड़ा है- क्या भारत अब एशिया में सिर्फ पदक जीतने वाला देश है या गोल्ड पर अपना दावा ठोकने वाली खेल शक्ति बन रहा है?

800 करोड़ रुपये का आंकड़ा सिर्फ हेडलाइन भर नहीं है. अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर पर 251.4 करोड़ रुपये खर्च हुए. घरेलू ट्रेनिंग पर 118.3 करोड़. उपकरणों पर 89.2 करोड़. विदेशी विशेषज्ञों पर 86.3 करोड़. विदेशी ट्रेनिंग पर 39.8 करोड़.

भारत इस बार 501 खिलाड़ियों के साथ उतरा है और इनमें 310 खिलाड़ी एशियन गेम्स में डेब्यू कर रहे हैं. 265 सदस्यीय सपोर्ट स्टाफ भी टीम के साथ है. यानी यह सिर्फ आज के पदकों की टीम नहीं, अगली पीढ़ी तैयार करने की कोशिश भी है.

इसलिए 2026 का फैसला सिर्फ मेडल टेबल से नहीं किया जा सकता. लेकिन पैसा सवाल से बचाता भी नहीं है. निवेश तैयारी को बेहतर बना सकता है, पदक की गारंटी नहीं. और नागोया का मैदान अब उसी निवेश की परीक्षा ले रहा है.

भारत की समस्या सिर्फ एक गोल्ड नहीं है. असली सवाल है कि कितने अलग-अलग खेलों में भारत के पास गोल्ड जीतने की स्थायी ताकत है?

हांगझोउ में शूटिंग और एथलेटिक्स ने बड़ी भूमिका निभाई. अकेले एथलेटिक्स ने 29 और शूटिंग ने 22 पदक दिलाए थे. शूटिंग से 7 गोल्ड और एथलेटिक्स से 6 गोल्ड आए थे.

यानी भारत की ताकत कुछ चुनिंदा खेलों में जरूर बढ़ी है, लेकिन चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी खेल शक्तियों की तरह कई खेलों में लगातार गोल्ड जीतने की चौड़ाई अभी भी बड़ा सवाल है.

यही वजह है कि 17 पदकों की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है- उसमें गोल्ड सिर्फ एक क्यों है?

भारत का एशियन गेम्स इतिहास भी इस बहस को और गंभीर बनाता है. दशकों में भारत ने पदकों की संख्या जरूर बढ़ाई है, लेकिन एशिया की शीर्ष खेल शक्तियों से उसका अंतर अब भी बड़ा है.

हांगझोउ में 106 पदक जीतने के बावजूद भारत चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के बाद चौथे स्थान पर था. इस बार शुरुआती चरण में भी यही तीन देश भारत से काफी आगे हैं. इसलिए भारत के लिए अगला कदम सिर्फ 100 पदक पार करना नहीं हो सकता.

कितने गोल्ड? कितने खेलों में गोल्ड? और कितने ऐसे खेल जहां चीन, जापान और कोरिया के सामने भारत सिर्फ मुकाबला नहीं, दबदबा दिखा सके?

एशियन गेम्स अंतिम मंजिल नहीं हैं. लॉस एंजिलिस 2028 की तैयारी का यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. कुछ खेलों में एशियन गेम्स का प्रदर्शन ओलंपिक क्वालिफिकेशन से भी जुड़ा है. इसलिए नागोया में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि भारत 100 या 106 के आसपास पहुंचता है या नहीं.

असली सवाल है- भारत की खेल ताकत कितनी गहरी हुई है?

800 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च के बाद अगर भारत सिल्वर-ब्रॉन्ज तो लगातार जीतता है, लेकिन गोल्ड की लड़ाई में सीमित नजर आता है, तो बहस सिर्फ पदकों की संख्या की नहीं होगी. बहस उस सिस्टम की होगी जो भारत को पोडियम पर तो पहुंचा रहा है, लेकिन सबसे ऊपर कितनी बार पहुंचा पा रहा है.

हांगझोउ ने भारतीय खेलों को 106 का सपना दिया था. नागोया अब उस सपने की परीक्षा ले रहा है. और उससे भी बड़ा सवाल- अगर एशिया में ही गोल्ड की लड़ाई अभी इतनी मुश्किल है, तो दुनिया की खेल महाशक्तियों के सामने ओलंपिक में अगली छलांग कितनी बड़ी होगी?

Original Source
https://www.aajtak.in/sports/asian-games/story/asian-games-2026-india-17-medals-only-one-gold-800-crore-preparation-bmsp-dskc-2652160-2026-09-25?utm_source=rss
Visit India Today ↗
SHARE STORY:
𝕏 f in

Related Coverage in World