स्कूल-कॉलेजों में रैंप, व्हीलचेयर और स्पेशल टॉयलेट्स बेहद जरूरी... CIC की UGC और CBSE को हिदायत
देश भर के स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए एक बेहद राहतभरी और महत्वपूर्ण खबर सामने आई है. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने देश की दो सबसे बड़ी शिक्षा संस्थाओं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को निर्देश दिए हैं कि वे शिक्षण संस्थानों में दिव्यांग छात्रों की पहुंच और सुविधाओं को लेकर कड़े कदम उठाएं.
सूचना आयुक्त सुधा रानी रेलंगी ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 की धारा 25(5) के तहत यह सिफारिशें जारी की हैं. आयोग का यह रुख यह सुनिश्चित करने के लिए है कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 (RPWD Act) के तहत हर स्कूल और कॉलेज में बैरियर-फ्री (बाधारहित) माहौल मिल सके. आइए जानते हैं कि CIC की इस बड़ी पहल और दोनों शिक्षा संस्थाओं के फैसलों में क्या-क्या है.
यह पूरा मामला बिहार के शिक्षण संस्थानों में दिव्यांगों के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को लेकर दायर की गई आरटीआई अपीलों के बाद सामने आया.एक अपीलकर्ता ने बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार यूनिवर्सिटी (BRABU) से संबद्ध कॉलेजों में दिव्यांगजनों की सुविधाओं को लेकर जांच रिपोर्ट और की गई कार्रवाई की जानकारी मांगी थी.
यूनिवर्सिटी ने सीआईसी को सूचित किया कि उसके प्रशासनिक भवनों और विभागों में रैंप बनाए जा चुके हैं और दिव्यांग पुरुष व महिला छात्रों के लिए अलग सुलभ टॉयलेट्स का निर्माण कार्य जारी है. साथ ही, सभी संबद्ध कॉलेजों को हैंडरेल वाले रैंप, लिफ्ट, रिजर्व पार्किंग, लाइब्रेरी सुविधाएं और व्हीलचेयर उपलब्ध कराने के सख्त निर्देश दिए गए हैं.
सीआईसी ने सिफारिश की है कि UGC देश भर की स्वीकृत यूनिवर्सिटीज के लिए 'राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज एक्ट, 2016' के तहत बाधारहित पहुंच की गाइडलाइंस जारी करे और उनका कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराए. वहीं दिल्ली-एनसीआर और बिहार के प्राइवेट व सरकारी स्कूलों में एक्सेसिबिलिटी सुविधाओं की मांग वाली दूसरी अपील पर सुनवाई करते हुए सीआईसी ने सिफारिश की कि CBSE सभी संबद्ध स्कूलों के लिए आवश्यक निर्देश जारी करे और एक मजबूत मॉनिटरिंग मैकेनिज्म (निगरानी तंत्र) बनाए, ताकि कोई भी बच्चा अपने अधिकारों और सुविधाओं से वंचित न रहे.
केंद्रीय सूचना आयोग ने दोनों मामलों में जन सूचना अधिकारियों (PIOs) द्वारा दिए गए जवाबों को आरटीआई एक्ट के तहत सही माना, लेकिन विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा को देखते हुए इस विषय को 'सर्वोच्च जनहित' से जुड़ा करार दिया.

