Dhanteras 2026: क्यों घर के मंदिर में नहीं रखनी चाहिए कुबेर की मूर्ति? जानें क्या कहता है वास्तु का नियम
घर में मंदिर बनवाते समय अक्सर इस बात का ध्यान रखा जाता है कि देवी-देवताओं की स्थापना किस दिशा में हो. ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा को देवस्थान के लिए विशेष शुभ माना गया है. यही कारण है कि घर का मंदिर इस दिशा में बनवाना शुभ है. लेकिन धन के देवता कुबेर को घर के मंदिर में स्थापित करने के बजाए उत्तर दिशा में रखना उचित माना जाता है. इसके पीछे केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वास्तु और ज्योतिष से जुड़ी मान्यताएं भी हैं.
उत्तर दिशा के स्वामी हैं कुबेर कुबेर को उत्तर दिशा का दिग्पाल और देवताओं का कोषाध्यक्ष माना गया है. वह धन-संपदा के संरक्षक हैं. जल तत्व की उत्तर दिशा को आर्थिक गतिविधियों, व्यापार, नए अवसरों और आय के साधनों से जोड़कर देखा जाता है. इसलिए इस दिशा में कुबेर की स्थापना का विशेष महत्व है. जब कुबेर को उनके अपने स्थान यानी उत्तर दिशा में स्थापित किया जाता है तो घर में धन के आगमन, उसके संरक्षण और आर्थिक उन्नति के लिए सकारात्मक वातावरण बनता है.
बुध ग्रह से है उत्तर दिशा का संबंध उत्तर दिशा का संबंध बुध ग्रह से भी माना जाता है. बुध बुद्धि, व्यापार, गणना, संवाद, लेखन, व्यावसायिक समझ और निर्णय लेने की क्षमता का कारक है. यही वजह है कि उत्तर दिशा को केवल धन रखने या तिजोरी की दिशा नहीं माना जाता, बल्कि इसे जीवन में नए अवसरों के प्रवेश का स्थान भी समझा जाता है. नौकरी में प्रमोशन, व्यापार में नए ग्राहक मिलना, कारोबार का विस्तार, नए संपर्क बनना और आय के नए रास्ते खुलना जैसी संभावनाओं को उत्तर दिशा से संबंधित है.
मंदिर और कुबेर का स्थान अलग क्यों? घर का मंदिर और कुबेर की स्थापना एक ही स्थान पर करने के बजाय दोनों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित करना बेहतर है. उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण को देवताओं की उपासना, ध्यान और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्थान माना जाता है. इसलिए यहां देवी-देवताओं का मंदिर बनाना शुभ माना जाता है. वहीं उत्तर दिशा कुबेर का अपना स्थान है. मां लक्ष्मी को धन, वैभव, ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी माना जाता है. जबकि कुबेर धन के संरक्षक और देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं.
इसलिए यदि घर में मंदिर ईशान कोण में बना है तो कुबेर जी की प्रतिमा या चित्र को मंदिर में रखने के बजाय उत्तर दिशा के स्वच्छ और व्यवस्थित स्थान पर स्थापित करना शुभ है. स्थापना करते समय प्रतिमा का मुख दक्षिण की ओर रखा जा सकता है. ताकि पूजन करने वाला व्यक्ति उत्तर की ओर मुख करके पूजा करे. उत्तर दिशा में गंदगी, अनावश्यक सामान और अव्यवस्था नहीं रखनी चाहिए.

