क्या आप जानते हैं F-1 ड्राइवर रेस में नकली घड़ी क्यों पहनते हैं?

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आपने कभी फॉर्मूला-1 रेस देखी है? इस रेस में आपने देखा होगा कि जो रेसर इसमें हिस्सा लेते हैं, उनके हाथ पर घड़ी बंधी होती है. लेकिन, क्या आप जानते हैं ये घड़ी असली नहीं होती है, बल्कि नकली होती है. अब सवाल है कि आखिर एफ-1 रेस के रेसर नकली घड़ी क्यों पहनते हैं. अगर उन्हें घड़ी पहनने...

आपने कभी फॉर्मूला-1 रेस देखी है? इस रेस में आपने देखा होगा कि जो रेसर इसमें हिस्सा लेते हैं, उनके हाथ पर घड़ी बंधी होती है. लेकिन, क्या आप जानते हैं ये घड़ी असली नहीं होती है, बल्कि नकली होती है. अब सवाल है कि आखिर एफ-1 रेस के रेसर नकली घड़ी क्यों पहनते हैं. अगर उन्हें घड़ी पहनने की इजाजत नहीं होती है तो फिर वे बिना घड़ी के रेस में हिस्सा क्यों  नहीं लेते हैं. तो समझते हैं आखिर इस नकली घड़ी की क्या कहानी है?

दरअसल, ये नकली घड़ी अलग से घड़ी  नहीं होती है. ऐसा नहीं है कि रेसर्स को ना चलने वाली घड़ी पहनाई जाती है. जिस नकली घड़ी की बात हो रही है, वो प्रिंटेड घड़ी होती है. ये अलग से प्रिंट नहीं होती जबकि गलव्स पर घड़ी प्रिंट की जाती है.  दस्तानों पर ही घड़ी बना दी जाती है, जो सिर्फ घड़ी की शेप का एक प्रिंट होता है. उनकी कलाई पर घड़ी नहीं होती, लेकिन रेसिंग ग्लव्स पर घड़ी का डिजाइन बना दिखाई देता है. पहली नजर में ऐसा लगता है जैसे ड्राइवर कोई नकली घड़ी पहनकर रेस कर रहा है.

अब बात करते हैं कि आखिर ये किया क्यों जाता है... इसके पीछे असल में एक दिलचस्प मार्केटिंग रणनीति है. इसका चर्चित उदाहरण मर्सिडीज और स्विस लग्जरी वॉच ब्रांड आईडब्ल्यूसी का है. मर्सिडीज के ड्राइवर लुई हेमिल्टन को रेस के दौरान सफेद ग्लव्स पहने देखा गया, जिन पर घड़ी का डिजाइन प्रिंट था. इसके अलावा भी कई रेसर के हाथ में प्रिंटेड घड़ी दिखी है. 

रेस के दौरान ड्राइवर का पूरा शरीर सुरक्षा उपकरणों से ढका होता है और हाथों में खास रेसिंग ग्लव्स होते हैं. ऐसे में कलाई पर घड़ी पहनने की जरूरत नहीं होती. इसके अलावा कई सुरक्षा कारणों की वजह से भी घड़ी नहीं पहनी जाती. ऐसा नहीं है कि कभी भी कोई रेस के वक्त असली घड़ी नहीं पहनता है, लेकिन ऐसा बहुत कम ही हुआ है. इस वक्त या तो रेसर खास तौर पर रेस के लिए डिजाइन की गई घड़ी पहनते हैं या आमतौर पर घड़ी नहीं पहनते हैं.

कुछ रेसर्स ने बताया है कि रेस के वक्त हर एक चीज के बारे में सोचा जाता है और हर एक ग्राम का महत्व होता है. इसलिए घड़ी को अवॉइड किया जाता है. अब सवाल है कि फिर नकली घड़ी प्रिंट करने का क्या लॉजिक है?

तो उसका जवाब है मार्केटिंग. जब रेसर घड़ी नहीं पहनते हैं तो स्पॉन्सर ब्रांड के लिए ड्राइवर की कलाई वाला हिस्सा भी विज्ञापन की अच्छी जगह बन जाता है. इसलिए असली घड़ी पहनाने के बजाय ग्लव्स पर उसका डिजाइन दिखा दिया जाता है. अलग-अलग एंगल से जब रेस को दिखाया जाता है तो उसमें रेसर के एक हाथ का शॉट भी आता है, जिसमें वो स्टीयरिंग पकड़े होते हैं. इस एंगल से जब वीडियो आता है तो नकली घड़ी का प्रिंट भी होता है और वो किसी कंपनी का विज्ञापन होता है. 

रेसर के हेलमेट और कार पर लगे कैमरे में ये दिखाई देता है. यानी ग्लव्स पर बना छोटा-सा घड़ी का डिजाइन भी लाखों दर्शकों की नजर में आता है, जिसे चतुर मार्केटिंग कहा जाता है.   

Original Source
https://www.aajtak.in/information/story/why-do-f1-drivers-wear-fake-printed-watches-tedu-dskc-2644715-2026-09-17?utm_source=rss
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