Global Tension: कर्ज तले दबी दुनिया... $365 ट्रिलियन का बोझ, लेकिन सबसे बड़ी है ये टेंशन

Direct Source Verification: This story is aggregated from India Today (indiatoday.in). Full reporting rights and copyright belong to the primary publisher.
दुनिया कर्ज तले दबती जा रही है और ग्लोबल ऋण अब 365 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. फाइनेंशिय कमेंट्री पब्लिकेशन 'द कोबेसी लेटर' ने इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस (IIF) के लेटेस्ट डेटा का हवाला देते हुए ग्लोबल कर्ज के बोझ को उजागर किया है. 2026 की पहली छमाही में इस रिकॉर्ड लेवल त...

दुनिया कर्ज तले दबती जा रही है और ग्लोबल ऋण अब 365 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. फाइनेंशिय कमेंट्री पब्लिकेशन 'द कोबेसी लेटर' ने इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस (IIF) के लेटेस्ट डेटा का हवाला देते हुए ग्लोबल कर्ज के बोझ को उजागर किया है. 2026 की पहली छमाही में इस रिकॉर्ड लेवल तक पहुंचे कर्ज में, सिर्फ छह महीनों में ही 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का उछाल आया है. 

आठ साल में यहां पहुंचा दुनिया का कर्ज वैश्विक ऋण (Global Debt) के आईआईएफ चार्ट को देखें, तो साफ पता चलता है कि बीते कई सालों में इसमें लगातार बढ़ोतरी होती गई है. वित्त वर्ष 2018 में लगभग 250 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर अब दुनिया का कर्ज 2026 की पहली छमाही तक ही लगभग 365 ट्रिलियन डॉलर का स्तर छू रहा है. 

कर्ज के आंकड़े में हालिया वृद्धि खासतौर पर उभरते बाजारों में देखने को मिली है. कोबेसी लेटर के मुताबिक, उभरते बाजारों का कर्ज 2026 की पहली छमाही में 6.5 ट्रिलियन डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 110 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया. इस इजाफे में सरकारों और नॉन-फाइनेंशियल कंपनियों का योगदान सबसे ज्यादा रिकॉर्ड किया गया है. 

रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन को छोड़कर उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में कुल कर्ज लगभग 38 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है, जो दुनिया की सबसे बड़ी उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के बाहर बढ़ती वित्तपोषण की जरूरतों को उजागर करता है. 

उभरते बाजार क्यों हैं केंद्र में?  365 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंचे दुनिया के कर्ज में उभरती अर्थव्यवस्थाएं केंद्र में हैं. दरअसल, सरकारों ने पब्लिक खर्च, इंफ्रास्ट्रक्चर और राजकोषीय घाटे के वित्तपोषण के लिए कर्ज लेना जारी रखा, जबकि कंपनियों ने भी निवेश और संचालन के वित्तपोषण के लिए कर्ज पर जोर दिया है. अब इसका असर ये हो रहा है कि सरकारों और कंपनियों को अपनी इनकम का एक बड़ा हिस्सा मौजूदा दायित्वों को पूरा करने में लगाना पड़ सकता है.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, उभरते बाजारों के लिए कर्ज की यह समस्या तब और भी जटिल हो सकती है, जब कर्ज विदेशी मुद्राओं में लिया गया हो. घरेलू मुद्रा के कमजोर होने से डॉलर या यूरो में लिए गए कर्ज को चुकाने की स्थानीय मुद्रा लागत बढ़ सकती है.

सबसे बड़ी चिंता तो ये सता रही ग्लोबल कर्ज बढ़ने के बीच सबसे बड़ी चिंताओं पर गौर करें, तो इनमें सिर्फ कर्ज का आंकड़ा नहीं, बल्कि उस कर्ज को चुकाने में कितना खर्च आता है, यह है. Kobeissi Letter में अनुमान जताया गया है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने पिछले वर्ष सरकारी ऋण पर 3.3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का ब्याज चुकाया और ब्याज का यह आंकड़ा वैश्विक खर्च के अनुमानों से कहीं अधिक रहा. इनमें एआई पर खर्च 2.6 ट्रिलियन डॉलर, डिफेंस पर 3.1 ट्रिलियन डॉलर, क्लीन एनर्जी पर 2.3 ट्रिलियन डॉलर शामिल हैं. 

ये आंकड़े इस तस्वीर को साफ करने के लिए काफी हैं, कि कैसे कर्ज चुकाने की लागत तेजी से सरकारी वित्त पर एक बड़ा बोझ बन गई है. जी7 देशों में वार्षिक सरकारी ब्याज भुगतान में भी भारी वृद्धि हुई है, कोबेसी लेटर के अनुसार इसमें साल-दर-साल 85% का इजाफा हुआ है. 

वैश्विक ऋण-से-जीडीपी अनुपात घटा Global Debt लगातार बढ़ रहा है, खास बात ये है कि वैश्विक ऋण-से-जीडीपी अनुपात महामारी काल के उच्चतम स्तर से नीचे रहने के बावजूद यह ग्रोथ हुई है. हालांकि, अनुपात में दिखने वाला यह सुधार एक महत्वपूर्ण कारक को छिपाता है, महंगाई ने नॉमिनल जीडीपी को ऊपर उठाया है, न कि विश्व में ऋण में व्यापक कमी आई है. हालिया कर्ज के आंकड़े एक महत्वपूर्ण अंतर की ओर इशारा करते हैं. वो ये है कि वैश्विक ऋण-से-जीडीपी अनुपात में 2021 के अपने उच्चतम स्तर से गिरावट आने का मतलब यह नहीं है कि दुनिया ने ऋणमुक्ति हासिल कर ली है.

कोबेसी लेटर में कहा गया है कि वैश्विक जीडीपी के लगभग 310% के बराबर ऋण भार अभी भी बहुत अधिक है. हालांकि, यह अनुपात कोरोना काल में अपने हाई से करीब 25% नीचे है. लेकिन इस गिरावट का यह अर्थ कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि सरकारों, कंपनियों और परिवारों ने अपने ऋण का काफी हद तक भुगतान कर दिया है.

एक्सपर्ट ने समझाया पूरा माजरा एक्सपर्ट ने इसमें बताया है कि ग्लोबल नॉमिनल जीडीपी में ग्रोथ आंशिक रूप से महंगाई के कारण हुई. इसका गणित समझें, तो जब कीमतें बढ़ती हैं, तो आर्थिक उत्पादन का नॉमिनल मूल्य बढ़ता है, भले ही वस्तुओं और सेवाओं की वास्तविक मात्रा उसी गति से न बढ़े. इससे ऋण-से-जीडीपी अनुपात अधिक प्रबंधनीय लग सकता है. साफ शब्दों में समझें, तो अगर नॉमिनल जीडीपी कर्ज की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ती है, तो डॉलर के संदर्भ में विश्व पर अधिक ऋण हो सकता है, जबकि उसका ऋण अनुपात कम हो जाता है.

Original Source
https://www.aajtak.in/business/news/story/global-debt-hits-365-trillion-dollar-big-concerns-is-interest-costs-of-debt-tutc-dskc-2654384-2026-09-27?utm_source=rss
Visit India Today ↗
SHARE STORY:
𝕏 f in

Related Coverage in World