ट्रंप की सरकार रहेगी, लेकिन पावर चली जाएगी? मिडटर्म में हार के होंगे साइड इफेक्ट!
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मिडटर्म इलेक्शन हार गए हैं. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी संसद में अल्पमत में आ गई है. ये बात अलग है कि डॉनल्ड ट्रंप अपना दो साल कार्यकाल पूरा करेंगे. लेकिन बचे हुए इन दो वर्षों में उनके लिए सरकार चलाना बहुत मुश्किल होगा, बहुत रुकावटें आएंगी, क्योंकि डेमोक्रेट्स उनके हर फैसले पर सवाल उठाएंगे, कानून बनने में बाधाएं डालेंगे.
मिडटर्म चुनावों के नतीजे डेमोक्रेट्स के पक्ष में रहे हैं. House of Representatives यानी कि प्रतिनिधि सभा की 435 सीट में डेमोक्रेट्स ने खबर लिखे जाने तक 228 सीटें जीत ली हैं, जो बहुमत से 10 सीट ज्यादा हैं. डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी 139 सीटें जीत चुकी है. पिछली बार की तुलना में इस बार रिपब्लिकन पार्टी को स्थिति बहुत खराब है. पिछली बार रिपब्लिकन पार्टी के पास 220 सीटें थीं.
इसके अलावा सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर भी चुनाव हुए थे. और इनके नतीजों ने डेमोक्रेट्स को बहुमत में ला दिया है. ताजा जानकारी मिलने तक नतीजों के बाद सीनेट में डेमोक्रेट पार्टी के सांसदों की संख्या 54 पहुंच गई है. वहीं रिपब्लिकन पार्टी सीनेट में 44 सीटों पर सिमट कर रह गई है.
तस्वीर साफ है. अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन अपना बहुमत खो चुकी है और उनकी विरोधी डेमोक्रेट्स को बहुमत हासिल हो गया है. डेमोक्रेट्स को मिला ये बहुमत आम बहुमत नहीं है, जैसा ट्रंप को दो साल पहले चुनाव जीतने पर मिला था. बल्कि डेमोक्रेट्स ने बहुमत से ज्यादा सीटें हासिल करके ये बता दिया है अब अमेरिकी जनता को ट्रंप की और उनकी पार्टी से ज्यादा भरोसा डेमोक्रेट्स पर है.
हालांकि साल 1938 के बाद 22 मिडटर्म चुनाव हुए हैं, जिसमें 20 बार ऐसे हुआ है कि तत्कालीन राष्ट्रपति हारे हैं. और इसमें अब डोनाल्ड ट्रंप का भी नाम दूसरी बार जुड़ गया है. पिछले कार्यकाल में भी वो अपना मिडटर्म चुनाव हार गए थे. डोनाल्ड ट्रंप को लगे इस झटके का अंदाजा उन्हें पहले से था. मिडटर्म चुनाव को मौजूदा सरकार की समीक्षा की तरह देखा जाता है. सीटों में थोड़ा बहुत ऊपर नीचे होना सामान्य है, लेकिन जिस तरह डेमोक्रेट्स ने बहुमत हासिल किया है, उससे ट्रंप बहुत आहत होंगे.
इस हार की तीन बड़ी वजहें बताई जा रही हैं.
दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद ट्रंप ने सरकार को अपने सख्त फैसलों पर चलाया है. और इसकी वजह थी दोनों सदनों में बहुमत का होना. लेकिन अब स्थिति बदल गई है. अब ट्रंप के विरोधी पार्टी की बहुमत है, ऐसे में कामकाज में बाधाएं आएंगी.
मिडटर्म चुनावों में हार के बाद डोनाल्ड ट्रंप के कामकाज पर निगरानी बढ़ जाएगी. अमेरिका के सरकारी कामकाज से जुड़ी कमेटियों के अध्यक्ष डेमोक्रेट्स ही बनेंगे. ऐसा हुआ तो वे ट्रंप के करीबी सरकारी अधिकारियों पर जांच बैठा सकते हैं. अमेरिका के बजट और टैक्स से जुडे प्रस्तावों को पास कराने में रिपब्लिकन्स को बहुत दिक्कतें आएंगी, क्योंकि डेमोक्रेट्स की बढ़ी संख्या रुकावटें पैदा करेगी, इससे सरकारी कामकाज बाधित हो सकता है.
अमेरिका में सीनेट ही जज, कैबिनेट मंत्रियों और अन्य अधिकारियों की नियुक्तियों को मंजूरी देती है. सीनेट में भी डेमोक्रेट्स को बहुमत मिल गया है. इस वजह से अब ट्रंप की पसंदीदा लोगों की नियुक्तियां फंसेंगी.
हालांकि ट्रंप ने दावा किया है कि अगर वो खुद चुनाव मैदान में उतरे होते तो जीत जाते उन्होंने ये भी कहा कि वो अगले दो साल हर फैसले पर वीटो लगाते हुए नहीं बिताना चाहते हैं. दरअसल ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति के उस अधिकार का जिक्र कर रहे थे। जिसमें उसे खास शक्तियां दी गई हैं.
अमेरिका के राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 1 और 2 के तहत एक बड़ी संवैधानिक शक्ति मिली है. इसके जरिए वो संसद से पारित हुए किसी भी विधेयक को कानून बनने से रोक सकते हैं. इसे ही राष्ट्रपति का वीटो पावर कहा जाता है.
ट्रंप का वीटो पावर बड़ी शक्ति तो है, लेकिन सबसे बड़ी शक्ति नहीं है. ट्रंप वीटो के जरिए विधेयकों को कानून बनने से रोक सकते हैं, लेकिन वीटो के खिलाफ संसद के पास एक और शक्ति है. राष्ट्रपति के वीटो पावर का तोड़ है Senate का दो तिहाई बहुमत. अगर किसी मुद्दे पर राष्ट्रपति ने वीटो लगाया, तो सीनेट दो तिहाई बहुमत से उसे गिरा सकती है. और कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर कानून बन जाता है.
मिड टर्म में ट्रंप की हार का असर उनके राजनीतिक भविष्य और उनके फैमिली बिजनेस पर भी पड़ सकता है. राजनीतिक विश्लेषकों को मानना है कि ट्रंप का बाकी बचा कार्यकाल, वो एक ऐसे राष्ट्रपति के तौर पर निभाएंगे, जिसके पास अकेले दम पर बड़े फैसले लेने की शक्ति नहीं होगी.
राजनीतिक विश्लेषक उनको 'Lame Duck' President यानी असमर्थ राष्ट्रपति के तौर पर देख रहे हैं. जो अब अपना बाकी बचा 2 साल का कार्यकाल समय काटने के लिए ही संभालेगा. दरअसल राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप का ये दूसरा कार्यकाल है. और अमेरिकी कानूनों के हिसाब से वो तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन पाएंगे. ऐसी स्थिति में उनकी अपने ही सांसदों और पार्टी पर पकड़ कमजोर होती जाएगी. अगला राष्ट्रपति उम्मीदवार कौन है, इसके लिए रिपब्लिकन नेता, ट्रंप की सलाह को नकार सकते हैं और मुमकिन है कई मौकों पर वो ट्रंप के फैसलों से खुद को अलग रख सकते हैं.
ऐसी स्थिति में डोनाल्ड ट्रंप का राजनीतिक भविष्य केवल अपने बचे हुए 2 साल के कार्यकाल को पूरा करना ही रह जाएगा और पार्टी भी उन्हें अलग थलग कर सकती है. अगर ऐसा हुआ तो उनपर तीसरी बार महाभियोग का खतरा मंडरा सकता है.
डेमोक्रेट्स किसी ना किसी बहाने तीसरी बार भी उनके खिलाफ महाभियोग ला सकते हैं. क्योंकि अबकी बार उनके पास प्रतिनिधि सभा में बहुमत है. लेकिन सीनेट में दोषी ठहराए जाने वाली प्रक्रिया ऐसी है कि कुछ भी हो सकता है.
मिड टर्म के बाद जैसी स्थिति बनी है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि रिपब्लिकन पार्टी के भी कई सांसद, ट्रंप के खिलाफ जा सकते हैं. इसकी वजह ये है कि ट्रंप तीसरी बार राष्ट्रपति उम्मीदवार नहीं बन सकते और जो भी रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनेगा, वो ट्रंप से दूरी बनाकर रखेगा.
मिडटर्म के बाद डेमोक्रेट्सट्रंप के खिलाफ एपस्टीन फाइल्स का मुद्दा उठाकर भी निशाना साध सकते हैं. दरअसल डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस की ओर से एपस्टीन फाइल्स को धीरे धीरे जारी किया जा रहा है, और इसमें काफी देरी हो रही है. संसद अटॉर्नी जनरल से इसमें हो रही देरी और कांट छांट पर साल पूछ सकती है. या जांच बैठा सकती है.
एपस्टीन के साथ संबंधो को ट्रंप इनकार करते हैं, लेकिन यौन अपराधी एपस्टीन और ट्रंप की बहुत सी तस्वीरें सामने आ चुकी हैं. मिडटर्म की हार ट्रंप की राजनीतिक भविष्य ही नहीं बल्कि उनके परिवार के लिए समस्या बन सकती है.
साल 2025 में डॉनल्ड ट्रंप ने अपने कारोबार से करीब 19 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा कमाए हैं. इस मामले में डेमोक्रेट्स फाइनेंशियल डिस्क्लोजर डॉक्यूमेंट के आधार पर जांचों बैठा सकते हैं. ट्रंप और उनके परिवार से जुड़े क्रिप्टो सौदे की भी जांच के दायरे में आ सकता है. ट्रंप और उनके परिवार ने क्रिप्टो वेंचर World Liberty Financial से ट्रंप ने 4730 करोड़ रुपये और 'ट्रम्प मीम कॉइन' से 5676 करोड़ रुपये कमाए हैं.
इसके अलावा साल 2025 में ट्रंप के नाम पर 20 हजार से ज्यादा स्टॉक डील्स हुई हैं, डेमोक्रेट्स का आरोप है कि पद पर हुए उन्हें स्टॉक ट्रेडिंग की है, गलत है. इसके अलावा ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर से जुड़ी व्यापारिक डील्स पर जांच बैठ सकती है. आरोप है कि कुशनर मिडिल ईस्ट में शांति दूत बनाए गए और तब उन्हें मिडिल ईस्ट से भारी फंडिंग मिली. इसे पद का दुरुपयोग माना जा रहा है.
यानी मिडटर्म चुनावों में मिली हार भविष्य में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए मुसीबत बन सकती है.
अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के नतीजों से एक बड़ा सवाल ये भी है कि भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा. इन चुनावी नतीजों से ट्रंप के एकतरफा और मनमानी फैसलों पर नियंत्रण लगेगा. जिससे भारत समेत हर उस देश को फायदा होगा जिसे वे टैरिफ की धमकी दे रहे थे.
अमेरिका भारतीय सामानों के लिए एक बड़ा बाजार है. इसलिए अमेरिकी टैरिफ नीति में कोई भी बदलाव सीधे तौर पर निर्यातकों को प्रभावित करता है. भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौता अभी तक धरातल पर नहीं उतरा है. इसी महीने भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी भारत अमेरिकी व्यापार समझौते को अंतिम चरण मे बताया था. लेकिन तब इसको मिड टर्म चुनाव से पहले की राजनीतिक गणित माना गया.
मिड टर्म चुनाव में ट्रंप की इस हार से दो चीजें हो सकती है. पहला ये है कि ट्रंप भारत पर दबाव बढ़ाकर व्यापार समझौते को अपने हिसाब से करवाने की कोशिश कर सकते हैं. और दूसरी चीज ये है कि भारत भी इन चुनावी नतीजों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकता है.
भारत ट्रंप प्रशासन से अच्छी मोलतोल कर सकता है. ट्रेड थिंक-टैंक 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर समझौते का दबाव बनाने के लिए अपनी Executive powers का इस्तेमाल कर सकते हैं. भारत की तरफ से इस डील का पेंच यही है कि अमेरिका की ओर से टैरिफ उतना ही रखा जाए जिससे भारतीय कंपनियां वहां बाकी कंपनियों से मुकाबला कर सकें.
इसके अलावा चुनावी परिणामों का असर अमेरिका की वीज़ा और इमिग्रेशन नीति पर भी पड़ सकता है, जिसका फायदा भारतीय प्रोफेश्नल्स को मिल सकता है. इससे उन भारतीयों को फायदा होगा जो H-1B वीजा पर अमेरिका में काम कर रहे हैं. मिडटर्म में डेमोक्रेट्स का बहुमत आने से इस नीति से जुड़े प्रस्तावों का विरोध हो सकता है.

