अमेरिका का 'पावर सेंटर' बने रहेंगे ट्रंप! जानिए चुनावी झटके के बावजूद कैसे जलवा रहेगा कायम
अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा. डेमोक्रेट्स ने संसद के दोनों सदनों यानी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत हासिल कर लिया है. इससे ट्रंप के लिए आने वाले दिनों में अपनी नीतियों को लागू करना आसान नहीं होगा. संसद में उनके फैसलों पर सवाल उठेंगे और सरकार के कामकाज की जांच भी बढ़ सकती है.
हालांकि, संसद में बहुमत बदलने का मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रपति की ताकत भी खत्म हो गई है. अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को कई ऐसे अधिकार देता है, जिनका इस्तेमाल वह संसद में विरोध के बावजूद कर सकते हैं. विदेश नीति, सेना और सरकारी एजेंसियों से जुड़े फैसलों में राष्ट्रपति की अहम भूमिका बनी रहती है. यही वजह है कि चुनावी झटके के बाद भी ट्रंप अमेरिका की सत्ता के बड़े पावर सेंटर बने रहेंगे.
ट्रंप की ताकत का एक बड़ा आधार राष्ट्रपति का वीटो अधिकार है. अगर संसद में डेमोक्रेट्स कोई ऐसा बिल पास कराते हैं, जो ट्रंप की नीतियों के खिलाफ है, तो राष्ट्रपति उसे रोक सकते हैं. इस फैसले को पलटने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है.
अमेरिका की मौजूदा राजनीतिक स्थिति में इतना बड़ा बहुमत जुटाना आसान नहीं है. इसलिए संसद में बहुमत होने के बावजूद डेमोक्रेट्स के लिए अपनी हर योजना को कानून बनाना मुश्किल होगा. हालांकि, संसद के पास कानून बनाने और सरकारी खर्च को मंजूरी देने का अधिकार बना रहेगा.
अमेरिका की विदेश नीति तय करने में राष्ट्रपति की अहम भूमिका होती है. वह दूसरे देशों के साथ बातचीत करते हैं और कूटनीतिक फैसले लेते हैं. राष्ट्रपति अमेरिकी सेना के कमांडर-इन-चीफ भी होते हैं.
संसद विदेश नीति से जुड़े फैसलों पर सवाल उठा सकती है. वह सैन्य अभियानों के लिए फंडिंग पर शर्तें लगा सकती है और सरकार से जवाब मांग सकती है. लेकिन संसद अपने आप राष्ट्रपति से विदेश नीति का पूरा नियंत्रण नहीं ले सकती. ऐसे में ट्रंप के पास कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में फैसले लेने की गुंजाइश बनी रहेगी.
ट्रंप की ताकत का एक और बड़ा आधार अमेरिकी सरकार की एजेंसियां हैं. इमिग्रेशन यानी आव्रजन से जुड़े फैसलों में होमलैंड सिक्योरिटी विभाग, USCIS, विदेश मंत्रालय और श्रम विभाग की अहम भूमिका है.
ट्रंप सरकार ने कई नीतियां कार्यकारी आदेशों और सरकारी नियमों के जरिए लागू की हैं. संसद में बहुमत बदलने से ये नियम अपने आप खत्म नहीं हो जाते. इन्हें बदलने के लिए नई प्रक्रिया अपनानी पड़ सकती है. कुछ मामलों में नए सरकारी आदेश, कानून या अदालत के फैसले की जरूरत भी हो सकती है.
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डेमोक्रेट्स अब संसद में जांच और निगरानी की ताकत का इस्तेमाल कर सकते हैं. वे सरकारी अधिकारियों को सवालों के जवाब देने के लिए बुला सकते हैं. इमिग्रेशन नीति, हिरासत और वीजा नियमों पर जांच कर सकते हैं. जरूरत पड़ने पर सरकारी दस्तावेज भी मांग सकते हैं.
लेकिन संसद की समितियां सीधे सरकारी एजेंसियों को अपनी पसंद के मुताबिक काम करने का आदेश नहीं दे सकतीं. सरकारी विभागों को चलाने और मौजूदा कानूनों को लागू कराने की जिम्मेदारी राष्ट्रपति और उनकी सरकार की होती है.
मिडटर्म चुनाव के बाद ट्रंप को संसद में पहले से ज्यादा विरोध का सामना करना पड़ेगा. उनके फैसलों पर जांच बढ़ सकती है और नई नीतियां लागू करना मुश्किल हो सकता है. अदालतें भी उनके फैसलों की समीक्षा कर सकती हैं. संसद सरकारी खर्च और कानूनों के जरिए उनकी नीतियों पर रोक लगाने की कोशिश कर सकती है.
इसके बावजूद ट्रंप के पास वीटो, सरकारी एजेंसियों पर नियंत्रण और विदेश नीति से जुड़े अहम अधिकार बने रहेंगे. ये अधिकार उन्हें हर लड़ाई में जीत की गारंटी नहीं देते, लेकिन राष्ट्रपति के तौर पर उनकी ताकत जरूर बनाए रखते हैं.
यानी मतलब साफ है कि संसद में सत्ता का समीकरण बदल गया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति पद के अधिकार खत्म नहीं हुए हैं. ट्रंप के लिए आगे का कार्यकाल ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा, मगर वह अब भी वॉशिंगटन के अहम पावर सेंटर बने रहेंगे.

