क्या है SMS ऑफ डेथ? कबाड़ बना देगा आपका स्मार्टफोन, करोड़ों पर संकट
स्मार्टफोन की दुनिया में एक खतरनाक सिक्योरिटी खामी का खुलासा हुआ है, जिसकी वजह से करोड़ों मोबाइल यूजर्स पर संकट भी मंडरा रहा है. दरअसल, SMS Of Death नाम की नई सिक्योरिटी वल्नरबिलिटीज सामने आई है, जो एंड्रॉयड स्मार्टफोन को पूरी तरह से खराब कर रही है. हालांकि इसका असर किन-किन देशों पर दिखा है, उसकी जानकारी नहीं है.
अजीबोगरीब खामी का सबसे पहले पता सिक्योरिटी रिसर्चर मार्क ब्लास्जिक ने लगाया था. अब इसको SMS ऑफ डेथ नाम दिया है. रिसर्चर के मुताबिक, इस अटैक के लिए एक खास SMS का इस्तेमाल किया है, जिसकी वजह से एंड्रॉयड स्मार्टफोन का सिस्टम क्रैश हो जाता है. फिर स्मार्टफोन काम करना बंद कर देता है.
स्मार्टफोन का फोन कॉल मैनेज करने वाला सिस्टम पूरी तरह से क्रैश हो जाता है. सभी कॉल भी डिस्कनेक्ट हो सकती हैं. साथ ही किसी इमरजेंसी नंबर पर भी कॉल नहीं कर पाएंगे.
रिसर्चर ने वॉर्निंग दी है कि ऐसे करीब 20 खतरनाक मैसेज किसी भी एंड्रॉयड स्मार्टफोन को पूरी तरह से कबाड़ बना सकते है.
रिसर्चर ने बताया है कि SMS ऑफ डेथ की वजह से स्मार्टफोन बूटलूप में फंस सकता है, इसका मतलब है कि एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम बार-बार SMS को प्रोसेस करने की कोशिश करता रहेगा और फिर फोन ठीक से चालू नहीं हो पाएगा.
SMS of Death की दूसरी सबसे बड़ी खतरनाक बात यह है कि इसका पता लगाना काफी मुश्किल होता है. यह मैसेज SMS के अंदर नहीं होता है. सिस्टम जैसे ही इसको क्रैश करता है, तो वह तुरंत क्रैश हो जाता है, जिसकी वजह से यूजर्स के पास कोई नोटिफिकेशन्स भी नहीं पहुंच पाता है.
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फैक्ट्री रिसेट करने के बाद समाधान नहीं मिल रहा है. दरअसल, अगर किसी नंबर पर ये मैसेज भेजे हैं, तो टेलीकॉम ऑपरेटर उन्हें दोबारा डिवाइस डिलिवर करने की कोशिश करता रहेगा. जब भी फोन ऑन होगा तो डिवाइस फिर से क्रैश हो जाएगा.
मीडिया रिपोर्ट्स में रिसर्चर का हवाला देकर बताया है कि फोन को कंप्यूटर से कनेक्ट करने के बाद इन मैसेज को देखा जा सकता है और डिलीट भी किया जा सकता है. हालांकि बहुत से यूजर्स को यह तरीका काफी मुश्किल भरा लग सकता है.
रिसर्चर ने बताया है कि 5 मई को सबसे पहले उन्होंने गूगल को इस खामी के बारे में जानकारी दी थी. हालांकि उनका यह भी कहना है कि गूगल ने बार-बार उनकी रिपोर्ट को सिक्योरिटी से जुड़ा मामला मानने से इनकार कर दिया है. हालांकि बाद में रिसर्चर को पता चला कि गूगल लंबे समय से इसको फिक्स करने की कोशिश में लगा है.


